यहां जानिए बांधवगढ़ में आखिर क्यों हो रही बाघों की लगातार मौत,क्या प्रबंधन के लिये बाघों की मौत उनके प्रेसनोट के बराबर है?

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उमरिया/बांधवगढ़ (संवाद)। विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की लगातार मौत बांधवगढ़ प्रबंधन के लिए कोई खास मायने नहीं रखता है, इसीलिए तो प्रबंधन के द्वारा बाघों की मौत संबंधी जानकारी के लिए जारी प्रेस नोट से समझा जा सकता है। या यह कहा जाए कि जितना छोटा उनका प्रेसनोट होता है इतना ही छोटा और मामूली वह बाघ की मौत को समझते हैं? इसके अलावा हम यहां जानेंगे कि लगातार सप्ताह भर के भीतर 2 वयस्क बाघों की असमय मौत की वजह क्या हो सकती?

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उमरिया/बांधवगढ़ (संवाद)। विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की लगातार मौत बांधवगढ़ प्रबंधन के लिए कोई खास मायने नहीं रखता है, इसीलिए तो प्रबंधन के द्वारा बाघों की मौत संबंधी जानकारी के लिए जारी प्रेस नोट से समझा जा सकता है। या यह कहा जाए कि जितना छोटा उनका प्रेसनोट होता है इतना ही छोटा और मामूली वह बाघ की मौत को समझते हैं? इसके अलावा हम यहां जानेंगे कि लगातार सप्ताह भर के भीतर 2 वयस्क बाघों की असमय मौत की वजह क्या हो सकती?दरअसल बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के वर्तमान समय का प्रबंधन, जंगल के सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण जानवर टाइगर को लेकर उसकी कोई दिलचस्पी नहीं समझ आती है। और ना ही बाघ की मौत के बाद उसके कारणों के पता लगाने में उनकी कोई रुचि है। कई मामलों में तो वह इसे दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष मानकर और बताकर मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं।सभी जानते हैं बारिश के दिनों में जब टाइगर रिजर्व को पर्यटकों के लिए बंद किया जाता है और लगभग यह 3 से 4 महीने के लिए बंद रहता है। इस दौरान जंगल के भीतर ना तो पर्यटक जा पाते हैं ना जिप्सी वाले और ना ही गाइड। इस बीच प्रबंधन भी मानसून वेकेशन मना रहा होता है, वह सुविधाएं और तनख्वाह तो जंगल और जंगली जानवरों की रखवाली के लिए लेता है। लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को कितना निभाता है वही जानते हैं। हां एक महत्वपूर्ण बात यह जरूर है कि इस दौरान जब जंगल में किसी की आवाजाही नहीं होती है तब वहां शिकारी इसका भरपूर फायदा उठाते हैं।गौरतलब है कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और उसके आसपास लगे जंगलों में कई दशकों से शिकारी सक्रिय हैं और वह खासकर इसी मानसून का फायदा उठाकर जंगलों में प्रवेश कर जाते हैं। जहां वह बाघ सहित कई जंगली जानवरों का शिकार आसानी से कर लेते हैं। यह बात ना कोई झूठी है और ना ही कोरी है। बल्कि इसके कई उदाहरण और सबूत भी हैं। आपने देखा सुना होगा कि कुछ महीने पहले टाइगर रिजर्व के भीतर एक कुएं से बाघ के हड्डियों का ढांचा बरामद हुआ था। उस समय पर जो जानकारी मिल रहे थी, उसमें यह की बाघ के महत्वपूर्ण अंग गायब है। जिसका मतलब आईने की तरह साफ है कि यह शिकार से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।इसके अलावा बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के पनपथा बफर पर क्षेत्र की घटना मैं एक भारी भरकम जंगली हाथी को मारकर जला दिया गया। जिसके बाद कई महीनों तक यहां का प्रबंधन आंखें मूंदे बैठा रहा। वह तो ग्रामीणों और कुछ मीडिया की मदद से इस मामले का खुलासा हो गया, नहीं तो जिम्मेदार मामले को दबा ही चुके थे। बाद में पूरे मामले की एसटीएफ जांच हुई और आरोपी कोई और नहीं बल्कि उस क्षेत्र का रेंजर और प्रभारी डिप्टी रेंजर निकले। हालांकि मामले में आरोपी तो सभी जिम्मेदार हैं क्योंकि कहीं ना कहीं यह बात सभी की जानकारी में रही है।बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 1 सप्ताह के भीतर एक मादा वयस्क बाघिन और फिर एक वयस्क बाघ की मौत हो जाना और प्रबंधन को इसकी कानो कान खबर नहीं होने से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह कितने सजग हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के मानपुर बफर परीक्षेत्र के देवरा बीट के अंतर्गत दोनों बाघों की मौत होना बताई जा रही है। जहां वह बाघ का कई दिनों पुराना क्षत-विक्षत हालत में मिला है। जबकि इसके 1 सप्ताह पहले इसी एरिया में एक बाघिन की मौत हो चुकी थी। इसके बाद भी प्रबंधन के द्वारा इस क्षेत्र में ना तो सघन पेट्रोलिंग की गई और ना ही गश्ती दल के द्वारा सघन गश्त की गई। प्रबंधन के द्वारा अगर इस क्षेत्र में लगातार पेट्रोलिंग की जाती तो, हो सकता है मृत बाघ इस हालत में नही होता। या उसे बचाया जा सकता था। निश्चित रूप से बाघ की क्षत-विक्षत हालत देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसकी भी मौत बाघिन के मौत के समय ही हुई होगी। हालांकि इन दोनो बाघों की मौत की वजह क्या रही है प्रबंधन इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं?
दरअसल बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के वर्तमान समय का प्रबंधन, जंगल के सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण जानवर टाइगर को लेकर उसकी कोई दिलचस्पी नहीं समझ आती है। और ना ही बाघ की मौत के बाद उसके कारणों के पता लगाने में उनकी कोई रुचि है। कई मामलों में तो वह इसे दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष मानकर और बताकर मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं।
सभी जानते हैं बारिश के दिनों में जब टाइगर रिजर्व को पर्यटकों के लिए बंद किया जाता है और लगभग यह 3 से 4 महीने के लिए बंद रहता है। इस दौरान जंगल के भीतर ना तो पर्यटक जा पाते हैं ना जिप्सी वाले और ना ही गाइड। इस बीच प्रबंधन भी मानसून वेकेशन मना रहा होता है, वह सुविधाएं और तनख्वाह तो जंगल और जंगली जानवरों की रखवाली के लिए लेता है। लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को कितना निभाता है वही जानते हैं। हां एक महत्वपूर्ण बात यह जरूर है कि इस दौरान जब जंगल में किसी की आवाजाही नहीं होती है तब वहां शिकारी इसका भरपूर फायदा उठाते हैं।
गौरतलब है कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और उसके आसपास लगे जंगलों में कई दशकों से शिकारी सक्रिय हैं और वह खासकर इसी मानसून का फायदा उठाकर जंगलों में प्रवेश कर जाते हैं। जहां वह बाघ सहित कई जंगली जानवरों का शिकार आसानी से कर लेते हैं। यह बात ना कोई झूठी है और ना ही कोरी है। बल्कि इसके कई उदाहरण और सबूत भी हैं। आपने देखा सुना होगा कि कुछ महीने पहले टाइगर रिजर्व के भीतर एक कुएं से बाघ के हड्डियों का ढांचा बरामद हुआ था। उस समय पर जो जानकारी मिल रहे थी, उसमें यह की बाघ के महत्वपूर्ण अंग गायब है। जिसका मतलब आईने की तरह साफ है कि यह शिकार से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
इसके अलावा बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के पनपथा बफर पर क्षेत्र की घटना मैं एक भारी भरकम जंगली हाथी को मारकर जला दिया गया। जिसके बाद कई महीनों तक यहां का प्रबंधन आंखें मूंदे बैठा रहा। वह तो ग्रामीणों और कुछ मीडिया की मदद से इस मामले का खुलासा हो गया, नहीं तो जिम्मेदार मामले को दबा ही चुके थे। बाद में पूरे मामले की एसटीएफ जांच हुई और आरोपी कोई और नहीं बल्कि उस क्षेत्र का रेंजर और प्रभारी डिप्टी रेंजर निकले। हालांकि मामले में आरोपी तो सभी जिम्मेदार हैं क्योंकि कहीं ना कहीं यह बात सभी की जानकारी में रही है।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 1 सप्ताह के भीतर एक मादा वयस्क बाघिन और फिर एक वयस्क बाघ की मौत हो जाना और प्रबंधन को इसकी कानो कान खबर नहीं होने से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह कितने सजग हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के मानपुर बफर परीक्षेत्र के देवरा बीट के अंतर्गत दोनों बाघों की मौत होना बताई जा रही है। जहां वह बाघ का कई दिनों पुराना क्षत-विक्षत हालत में मिला है। जबकि इसके 1 सप्ताह पहले इसी एरिया में एक बाघिन की मौत हो चुकी थी। इसके बाद भी प्रबंधन के द्वारा इस क्षेत्र में ना तो सघन पेट्रोलिंग की गई और ना ही गश्ती दल के द्वारा सघन गश्त की गई। प्रबंधन के द्वारा अगर इस क्षेत्र में लगातार पेट्रोलिंग की जाती तो, हो सकता है मृत बाघ इस हालत में नही होता। या उसे बचाया जा सकता था। निश्चित रूप से बाघ की क्षत-विक्षत हालत देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसकी भी मौत बाघिन के मौत के समय ही हुई होगी। हालांकि इन दोनो बाघों की मौत की वजह क्या रही है प्रबंधन इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं?

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