उमरिया नपा चुनाव में चुनावी प्रक्रिया के पहले चरण में कांग्रेस पास तो भाजपा हुई फेल

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कौशल विश्वकर्मा, 9893833342
उमरिया (संवाद)। कहते है जिसका शुरू से मैनेजमेंट अच्छा होता उसका हर काम अच्छा होते चला जाता है, और यही कारण है कि नगर पालिका उमरिया के चुनाव में प्रारंभिक दौर पर कांग्रेस पास होते दिखाई दे रही है वही भाजपा फेल साबित होते दिखाई दे रही है।
टिकिट वितरण और प्रत्यासी चयन में चूक
नगरीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की शुरुआती दौर में अच्छी रणनीति से काम शुरू हुआ। प्रत्याशी के चयन के लिए वार्ड प्रभारी बनाए गए जो वार्डों में जाकर प्रत्याशी की स्थिति और वार्ड वासियों के बीच में रायशुमारी की गई। जिसमें जो दावेदार का नाम निकल कर सामने आया उसी आधार पर पार्टी के तरफ से अधिकृत उम्मीदवार बनाया जाना था। लेकिन कुछ वार्डों को छोड़कर बाकी जगह मनमाने तरीके से उम्मीदवार बनाए गए। वार्ड नंबर 6 में पार्टी द्वारा बनाए गए उम्मीदवार की बात करें तो उसका हाल ही में एक वीडियो सोशल मीडिया में दिखाई दे रहा है, जिसके बारे में सभी को ज्ञात हैं। इसके अलावा सभी को पहले से  जानकारी में था कि इस वार्ड से कांग्रेस का कौन प्रत्याशी होगा? बावजूद इसके, उनके मुकाबले भाजपा का अधिकृत प्रत्याशी समझ में नहीं आया। वहीं इसके अलावा अन्य कई वार्डों में यही स्थिति दिखाई पड़ रही है। वहीं चुनावी रणनीति के तहत प्रत्येक वार्ड में डमी कैंडिडेट का फार्म नही भराया गया, इसे भी एक चूक की नजर से देखा जा रहा है।
वार्ड आरक्षण की अनदेखी
इस पूरे मसले पर खास बात यह है कि जिन वार्डों को जिस वर्ग के लिए आरक्षित किया गया था, जिसमें भाजपा को कोशिश करनी चाहिए थी कि जो वार्ड जिस वर्ग के लिए आरक्षित है उसी वर्ग से उम्मीदवार बनाया जाना था। लेकिन कुछ वार्डों को छोड़कर बाकी जगह इसका भी ध्यान नहीं रखा गया  इसके अलावा महिला के लिए निर्धारित आरक्षण से कहीं अधिक महिलाओं को अधिकृत किया गया इसमे भी पार्टी की सूझबूझ समझ से परे है।
बिना राजा की फौज
अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाली भाजपा संगठन में पहली बार अनुशासन की कमी देखने को मिली है। इसके पहले भाजपा की रणनीति और उसके अनुशासन के बारे में लोग चर्चा किया करते थे और कुछ अन्य राजनीतिक संगठन के लोग भी यह कहते नजर आते थे कि अनुशासन और सामंजस्य देखना हो तो भाजपा से बेहतर कहीं नहीं है। लेकिन नगरपालिका चुनाव में अनुशासन नहीं दिखाई दे रहा है  चुनाव प्रक्रिया के दौरान सब अलग-थलग दिखाई पड़ रहे थे जैसे कई गुट और गुटबाजी चल रही हो। इस पूरी प्रक्रिया में कोई संगठन का प्रमुख गाइड करने वाला मौजूद नहीं था और इस प्रक्रिया पर ध्यान देने वाला संगठन का कोई जिम्मेदार दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिया। सभी अपने अपने में उलझे नजर आए। बल्कि इस बार कांग्रेस जो रणनीति अपना रही वह बेहतर और प्रभावी है। पूरे शहर में यह बात चर्चा का विषय बना हुआ है।
वरिष्ठों की उपेक्षा
भाजपा में पहली बार यह भी देखने को मिला है कि वरिष्ठों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। इसके पहले भी यहां संगठन मौजूद था तब कभी कुछ नहीं हुआ सब बेहतर तरीके से चलता रहा है। वहीं इस बार के चुनाव में पहले से ही कई भाजपा के वरिष्ठ नेता चुनाव लड़ने की तैयारी में थे, लेकिन उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया। इसके अलावा उन्हें टिकट देना तो दूर उनसे इस पूरे मसले पर सलाह भी नहीं ली गई। जबकि सभी भाजपा के वरिष्ठ नेता नगरपालिका के पूर्व में हुए कई चुनाव को बड़े नजदीक से देखा है और कराया भी है। इस बार के चुनाव में भी आज उन्हीं की आवश्यकता है जो बेहतर रणनीति से इस पूरे प्रक्रिया को संपन्न करा सकते है। लेकिन उन वरिष्ठ नेताओं को टिकट देना तो दूर उनसे इस पूरे चुनावी मसले पर सलाह लेना भी मुनासिब नहीं समझा गया।
इस पूरे चुनावी प्रक्रिया में सबसे प्रमुख पहलू यह कि जिला स्तर के नेता जो कई साल से चुनाव लड़ने की तैयारी में थे और अपने ही वार्ड नंबर 7 से दावेदारी कर रहे थे। मगर सोचने वाली बात यह है कि यह वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित था फिर भी उनके द्वारा इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। जब उनके पास ओबीसी का उचित फॉर्मेट में प्रपत्र नहीं था, तब उन्हें उस वार्ड से उम्मीदवारी बिल्कुल नहीं करनी थी। इनके लिए उन्हें अन्य किसी अनारक्षित वार्ड से उम्मीदवार करना था,  जबकि वे अन्य किसी वार्ड से भी आसानी से चुनाव  जीत सकते थे।
वो तो भला हो भाजपा के कार्यकर्ता मनोज विश्वकर्मा का जो धोखे से अपनी पत्नी का नामांकन इस वार्ड से भरा दिया नहीं तो कांग्रेस का उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीतकर इतने बड़े संगठन पर सवालिया निशान लगा देता? दूसरा भला हो जिला निर्वाचन अधिकारी का जो उचित फार्मेट में प्रपत्र जमा करने के लिए 2 दिन का समय निर्धारित किया है। फिलहाल इस मसले पर अभी 2 दिन का समय शेष है इस बीच ओबीसी का प्रमाण पत्र 22 जून तक जमा किया जाना है।
हालांकि इस पूरे मसले पर संगठन का मानना है कि जिला संगठन में मौजूद अन्य पदाधिकारी जो जिला मुख्यालय में मौजूद है उनका दायित्व था कि वे स्थानीय स्तर पर सभी साथ लेकर सामंजस्य बनाकर चुनावी रणनीति तैयार करना था लेकिन जिला मुख्यालय के पदाधिकारियों ने व्यक्तिगत कार्यो के कारण इस पर ध्यान नही दिया जिससे ऐसी स्थिति निर्मित हुई है। चूंकि भाजपा जिलाध्यक्ष का निवास पाली में है, इस लिहाज से भी जिला मुख्यालय में मौजूद उनके टीम के प्रमुख पदाधिकारियों को सामंजस्य बनाना था लेकिन वे अपनी चुनावी गणित में उलझे रहे।
बहरहाल नगरीय निकाय की चुनावी प्रक्रिया अभी पूरी शेष है और भाजपा के पास पर्याप्त समय है। इएलिये एक बार फिर भाजपा जिला अध्यक्ष दिलीप पाण्डेय को चाहिए की पूरी कमान अपने हाथों में लेकर विचार करें और स्थानीय स्तर पर मौजूद वरिष्ठ नेताओं, जिला, नगर सहित तमाम पदाधिकारियों और भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ सामंजस्य बनाकर चुनावी मैदान में उतरकर और बेहतर तरीके से पूरी चुनावी प्रक्रिया को संपन्न कराने की आवशकता है।
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